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OBC तीसरा विकल्प

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2014 के भारत में देश के 90% लोगो के जीवन में शिक्षा, सम्पति और शस्त्र धारण करने के अधिकारों लाने के लिए जिन्हों ने बहुत कुछ संघर्ष किया है ऐसे महात्मा जोतिबा फुले, बिरसा मुंडा, छत्रपति शाहूजी महाराज, डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर, रामस्वरूप वर्मा, रामासामी पेरियार, बीपी मंडल और वीपीसिंह की वजह से आप सभी मित्रो के लिए आये आज के बहेतर नये साल के बहेतर प्रथम दिन पर बहुत सारी शुभकामनाए..


2014 के भारत में देश के 90% लोगो के जीवन में शिक्षा, सम्पति और शस्त्र धारण करने के अधिकारों लाने के लिए जिन्हों ने बहुत कुछ संघर्ष किया है ऐसे महात्मा जोतिबा फुले, बिरसा मुंडा, छत्रपति शाहूजी महाराज, डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर, रामस्वरूप वर्मा, रामासामी पेरियार, बीपी मंडल और वीपीसिंह की वजह से आप सभी मित्रो के लिए आये आज के बहेतर नये साल के बहेतर प्रथम दिन पर बहुत सारी शुभकामनाए..आनेवाला नया साल आप के सभी  संवैधानिक अधिकारों को  लागु करवानेवाला हो ऐसी शुभकामनाए..

आनेवाला नया साल आप के सभी संवैधानिक अधिकारों को लागु करवानेवाला हो ऐसी शुभकामनाए..

शहीद लक्ष्मी नारायण तेली

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जय राजिम मित्रों
इस पुस्तक के पृष्ठ 162 में महासमुंद के सत्याग्रह में लक्ष्मी नारायण तेली के शहीद होने का उल्लेख है | खल्लारी विधायक श्री चुन्नी लाल साहू विगत छः माह से इस शहीद के परिवार की तलाश घटना स्थल के आसपास के गाँवों में कर रहे हैं लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिला है ,यह उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा है | 
यह पुस्तक म प्र हिंदी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित है ,जो स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम का हिस्सा है | 
यदि शहीद लक्ष्मी नारायण तेली के परिजनों का पता लग जाता है ,तब हम गर्व से कह सकेंगे कि हमारे समाज में भी शहीद हैं | न में भी साहू कई वीरों ने बढचढ कर हिस्सा लिया था |

Chhattisgarh Sarv Sahu Samaj's photo.

सन 1930 के जंगल सत्याग्रह में 9 साहू वीरों के शामिल होने का दस्तावेजी प्रमाण हैं ,जिनके बारे में हम पहले ही लिख चुके हैं |भारत छोड़ो आन्दोलन में भी साहू कई वीरों ने बढचढ कर हिस्सा लिया था |

Rmdas Aathavle

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aajchya dated 23 oct 2014 chya dainik PUNYA NAGARI madhil PARIVARTAN sadratil ha lekh vacha v etranparyant janyasathi share,like and comments kara

Rmdas Aathavle

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aajchya dated 23 oct 2014 chya dainik PUNYA NAGARI madhil PARIVARTAN sadratil ha lekh vacha v etranparyant janyasathi share,like and comments kara

नारायण सिंह

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जय राजिम मित्रों 
रायपुर जिला ( पुराना) के सोनाखान के बिंझवार ज़मींदार नारायण सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त युद्ध छेड़ा था | सन 1856 में अकाल पड़ा था ,जनता भूखों मर रही थी तब नारायण सिंह ने एक जमाखोर व्यापारी के गोदाम में रखे अनाज भूखी जनता में बाँट दिया था | अंग्रेजी सरकार ने डकैती के आरोप में इन्हें 24 अक्टूबर 1856 को गिरफ्तार कर रायपुर के सेन्ट्रल जेल में कैद कर दिया था | नारायण सिंह 28 अगस्त 1857 को जेल में सुरंग बनाकर भाग निकले और सोनाखान पहुँच कर 500 वनवासियों का सेना गठित किया | 2 दिसंबर को अंग्रेजी सेना और नारायण सिंह के सेना की बीच युद्ध हुआ और नारायण सिंह गिरफ्तार हुए | 10 दिसम्बर 1857 को नारायण सिंह को संभवतः जय स्तम्भ चौक में फांसी पर लटकाया गया या तोप से उड़ाया गया ( इस पर इतिहास कारों में मतभेद है ) | 
शहीद वीर नारायण सिंह की याद में 10 दिसम्बर को शहीद दिवस मनाया जाता है |

जय राजिम मित्रों रायपुर जिला ( पुराना) के सोनाखान के बिंझवार ज़मींदार नारायण सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त युद्ध छेड़ा था | सन 1856 में अकाल पड़ा था ,जनता भूखों मर रही थी तब नारायण सिंह ने एक जमाखोर व्यापारी के गोदाम में रखे अनाज भूखी जनता में बाँट दिया था | अंग्रेजी सरकार ने डकैती के आरोप में इन्हें 24 अक्टूबर 1856 को गिरफ्तार कर रायपुर के सेन्ट्रल जेल में कैद कर दिया था | नारायण सिंह 28 अगस्त 1857 को जेल में सुरंग बनाकर भाग निकले और सोनाखान पहुँच कर 500 वनवासियों का सेना गठित किया | 2 दिसंबर को अंग्रेजी सेना और नारायण सिंह के सेना की बीच युद्ध हुआ और नारायण सिंह गिरफ्तार हुए | 10 दिसम्बर 1857 को नारायण सिंह को संभवतः जय स्तम्भ चौक में फांसी पर लटकाया गया या तोप से उड़ाया गया ( इस पर इतिहास कारों में मतभेद है ) | शहीद वीर नारायण सिंह की याद में 10 दिसम्बर को शहीद दिवस मनाया जाता है |

mpsc के नौकरियों मे पिछडों का मेरिट खत्म

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लो भई देश मे तो अच्छे दिन आ चूके थे अब महाराष्ट्र मे भी आ गये।सभी किसान मजदूर ओबीसी समाज को केवल एंजाय करना बाकी है।मुझे चिंता हो रही उद्योपगति व्यापरियों की क्योंकि आज तक ये वर्ग देशके संपत्ति जमिन एवं नैसर्गिक संसाधनों का बहोत बड़ा उपभोक्ता रहा हैं।अरे हा काँग्रेस राष्टवादी के पराभव के समिक्षा बैठक मे ओबीसी जनगणना शिष्यवृत्ती शिक्षा का बाजारीकरण पेसा कानून से ओबीसीयोंका आरक्षण खत्म करना mpsc के नौकरियों मे पिछडों का मेरिट खत्म करना ओबीसीयोंका अनुशेष पदोन्नति आरक्षण स्वतंत्र कृषि बजेट स्वतंत्र ओबीसी मंत्रालय आदी मुद्दों का भी कोई जिक्र करना भाई।
मंडल आयोग का पिछला इतिहास देखते हुए भाजपा सरकार ये सब करेंगी ऐसी अपेक्षा जानकार ओबीसीयोको तो नही हैं किंतु इतिहास पता नही रखनेवाले ओबीसी हिंदू तो अच्छे दिनके सपनोमेच एवं काँग्रेस केखिलाफ भडास निकालनेमेच खुश हैं ।ओबीसी भाईयों जरा अपने संवैधानिक अधिकारोंके बारे मे भी सोच लिया करो।नहीतो आनेवाले कल मे आपका बेटा कही नपुंसक ना कहे आपको।

शाळा.. इयत्ता दहावी.. चारच तुकड्या..

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शाळा.. इयत्ता दहावी.. चारच तुकड्या... अ, ब, क, ड. प्रत्येक वर्गात सत्तरचा पट. तडीपारांची वस्ती असलेल्या परिसरातील नावाजलेली शाळा.तर 'अ' वर्गातील मुलं. टेक्निकल ला जाणारी. टेक्निकल ला जातात म्हणून त्यांना एक्स्ट्राचे चार टक्के जे फ्री मध्येच वाटले जातात. म्हणून नव्वद टक्के मिळवणारा एखादाच पोरगा पण चौऱ्याण्णव टक्के घेऊन पुढे येणार. आमच्या शाळेला कधी 90 टक्केवाला पोरगा बापजन्मात नाय मिळाला. तर, ह्या मुलांचा वर्ग भरायचा तो सकाळी साडे सहा वाजता. एक्स्ट्रा क्लासेस. एक्स्ट्रा एक्झाम वगैरे वगैरे... बरं ह्या अ वर्गातल्या मुला मुलींची मैत्री फार फार तर 'ब' तुकडीतल्या मुला मुलींबरोबर असायची. क आणि ड तुकडी अस्तित्वात नसल्यासारखीच असायची. पोरं- पोरं रंगाने एकदम गोरे गोमटे. निबंध, वक्तृत्व, संगीत, प्रज्ञा, प्राविण्य परिक्षांमध्ये पुढे. हिंदीच्या परिक्षेत पुढे. सगळे कुलकर्णी, देसाई, जोशी, आडकर, आगरकर त्याच वर्गात. बाकीचे तीनही वर्ग या मुलींवर लाईन मारायला पटाईत असायचे. असो.. स्पेशल ट्रीटमेंट वाली अ तुकडी.. यांना अभ्यास सोडून बाकी काहीच टेंशन नाही.

'ब' तुकडीतील मुलं. साधारण 60 ते 70 टक्क्यांतली. यात प्रामुख्याने सगळे देशमुख, जाधव, पवार, शिंदे, गायकवाड या आडनावाची पोरं पोरी. क्लासला जाणारी ही पोरं संगणकाच्या वर्गाला. अ तुकडीपेक्षा थोडं कमीच लक्ष दिलं जायचं. यांना पण अनेक गोष्टीत आरामात सामावून घेतलं जात होतं. शाळेतले फळे लिहीणे वगैरे सारखी कामं सोपवली जायची.

'क' तुकडी... बिच्चारी अतिशय वात्रट पोरं. त्यांना कोणीच जवळ करत नव्हतं. 40 ते 60 टक्क्यांमधली पोरं. कोणत्याच प्रकारचे स्पेशल लेक्चर नाही. प्रयोगशाळेत कधी नेलं तर नेलं. अवस्था विचित्रच. फी माफीचे फॉर्म जेव्हा निघायचे तेव्हा अख्खा वर्ग ओबीसीचा फॉर्म भरायचा. या वर्गातले बरेचसे आज तिसऱ्या श्रेणीतले कर्मचारी आहेत.

'ड' तुकडी... या तुकडीत मी होतो. फी माफीचा फॉर्म यायचा तेव्हा ओळीनं फॉर्म वाटणं, लिहून, भरून घेणं ही माझी जबाबदारी. एकजात एससी, एसटी शिवाय वेगळं काही लिहावं लागत नसे. निम्म्याहून अधिक पोरं ही लाईन बॉईज. भर वर्गात बाँम्बे तोंडात टाकून बसायचे. ज्यांचा बाप हेड काँन्स्टेबल ती पोरं ऐपतीप्रमाणे एक रुपायाचा गोवा.. बाकीचे जास्तीचे थेट मावा खाऊन वर्गात बसायचे. शिक्षक वर्गातल्या पोरांना ओरडायला घाबरायचे. बापाची भीती झाटभरची. बाप करून करून काय करेल तर पट्ट्याने फोडून काढेल. पण आईची भीती घातली की सगळे गप्प... 
यांना ना टेक्नीकल, ना संगणकाचा विषय.. तोंडी लावायला कार्यानुभव. शाळेत कोणताही कार्यक्रम असो.. बाकं उचलणं, टेरेस साफ करणं, खेळांसाठी मैदान तयार करणं, दिंड्या काढणं, उन्हातान्हात फेऱ्या काढणं यासाठी ड तुकडी हमखास राखीव असायची. या वर्गाला कधी कोणत्या स्पर्धा नाही. कधी कोणत्या परिक्षा नाहीत. संधी नाहीत. कधी कोणतं एक्स्ट्रा लेक्चर नाही. तरी असो.. माझे वर्गातले बरेचसे साथीदार आज थोडे थोडके का होईना चांगल्या अवस्थेत दिसतायेत. बाप तडीपार, आई घरकाम करणारी अशी प्रत्येकाची स्थिती..

मी या ड तुकडीतलाच होतो. म्हणून मला माझं बालपण मला कोणत्याच किमतीवर परत नकोय.

महिषासुर शहादत दिवस

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नई दिल्ली। जनवादी लेखक संघ ने फारवर्ड प्रेस के बहुजन– श्रमण अंक का समर्थन करते हुए फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ पुलिस दमन की निंदा की है वहीं बिहार के भागलपुर में फोरम फॉर फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन ने प्रतिरोध मार्च निकाला। फोरम की संयोजक ओम सुधा ने कहा कि ‘गृह मंत्रालय को तत्काल प्रभाव से फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ ऍफ़ आई आर वापस लेनी चाहिए।’पटना में लेखकों ने बैठक की और पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा भी की तथा कहा कि पुलिस की यह कार्रवाई भारतीय संविधान के खिलाफ है, जो अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता देता है। इस बीच दक्षिणपंथी छात्रों के समूह ने वसंतकुंज थाने में एक और शिकायत भेजकर चित्रकार लाल रत्नाकर, जिन्होंने ‘दुर्गा मिथ’ के नए पाठ के साथ चित्र कथा प्रस्तुत की है तथा फॉरवर्ड प्रेस के एक लेखक के खिलाफ कारवाई की मांग की है।

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह व उपमहासचिव संजीव कुमार ने एक संयुक्त वक्तव्य में कहा, “फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका के नेहरु प्लेस स्थित दफ़्तर पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा द्वारा 9 अक्टूबर को छापा मार कर चार कर्मचारियों की गिरफ़्तारी और अगले दिन, 10 अक्टूबर को विभिन्न विक्रेताओं के यहाँ से उक्त पत्रिका की प्रतियों की ज़ब्ती बेहद चिंताजनक और निंदनीय घटनाक्रम है। पुलिस के पास अपनी इस कार्रवाई के लिए कोई अदालती आदेश या सक्षम प्राधिकारी का आदेश नहीं था। बताया जाता है कि यह कार्रवाई वसंत कुञ्ज पुलिस थाने में दर्ज की गयी एक शिकायत के आधार पर की गयी है। पत्रिका का यह अंक बहुजन-श्रमण परम्परा पर केन्द्रित है। दुर्गा के हाथों असुर जाति के राजा महिषासुर के वध की पौराणिक कथा को आर्य-अनार्य संघर्ष की एक कड़ी के रूप में चिन्हित करते हुए इसे महिष की शहादत के तौर पर व्याख्यायित करने वाले लेख इस अंक में हैं। यह हिन्दुत्ववादियों की नाराजगी का सबब हो सकता है, जिन्होंने पहले भी ऐसे मुद्दों पर आस्था को आहत करने का नुक्ता उठा कर हंगामे किये हैं। 9 अक्टूबर की शाम को जे एन यू में महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने के मौक़े पर भी आर एस एस के छात्र मोर्चे, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने उत्पात मचाया। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और ए बी वी पी का उत्पात, दोनों एक ही श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। हम इसे केंद्र में भाजपा के आने के बाद प्रतिक्रियावादी, साम्प्रदायिक-फ़ासीवादी ताक़तों के बुलंद होते हौसले और पुलिस-प्रशासन के स्तर पर उन्हें उपलब्ध कराई जा रही सहूलियतों के ख़तरनाक उदाहरण के रूप में देखते हैं। जनवादी लेखक संघ उक्त पत्रिका पर बिना अदालती आदेश के की गयी इस कार्रवाई और अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ ऐसे असंवैधानिक खिलवाड़ की कठोर शब्दों में भर्त्सना करता है। जनेवि में महिषासुर शहादत दिवस के मौके पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के उत्पात की भी हम निंदा करते हैं। कार्रवाई, दरअसल, उन उपद्रवियों के ख़िलाफ़ होनी चाहिए जो असहमतियों को लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर रह कर व्यक्त करना नहीं जानते। असहमतियों की अभिव्यक्ति के इन लोकतंत्र-विरोधी तौर-तरीक़ों को भाजपा के शासन में जिस तरह खुली छूट मिल रही है, वह चिंताजनक है। भाजपा नेता सुब्रमन्यम स्वामी का तीन दिन पहले दिया गया यह बयान कि बिपन चन्द्र और रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों की किताबें जला देनी चाहिए, ऐसे ही तौर-तरीक़ों का एक नमूना है।”

जनवादी लेखक संघ ने इस प्रवृत्ति के भर्त्सना करते हुए सभी धर्मनिरपेक्ष और जम्हूरियतपसंद लोगों से इसके ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील की है। जलेस ने कहा है, “हम सरकार से यह मांग करते हैं कि फॉरवर्ड प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी सुनिश्चित करे, उस पर हुए ग़ैरकानूनी पुलिसिया हमले की सख्ती से जांच हो, उसे अंजाम देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए और जनेवि में महिषासुर शहादत दिवस के मौक़े पर तोड़-फोड़ करनेवाले तत्वों के ख़िलाफ़ भी क़ानूनी कार्रवाई की जाए।”


मेरठ की भूली बिसरी यादें

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एक अधूरा संवादः मेरठ की भूली बिसरी यादें

मेरठ की ऋचा अग्रवाल ने इस संवाद की शुरुआत की थी और उन्होंने ही इसे अधूरा छोड़ दिया।मेरठ में हम 1984 से 190 तक रहे।कोलकाता आने के बाद एक बार गये मेरठ,फिर जाना नहीं हो सका।अब हमें यह नहीं मालूम कि मेरठ के मित्र कहां किस हाल में हैं।गलती से मेरठ पहुंच गये तो कहां ठहरना होगा,इसका अंदाजा भी नहीं है।मेरठ, मुरादाबाद, बुलंदशहर,अलीगढ़ और मुजफ्परनगर इस देश के संपन्न किसानों के इलाके रहे  हैं।अब वे इलाके कितने संपन्न हैया नहीं हैं,इसका अंदाजा नहीं है।

पलाश विश्वास

मुजफ्परनगर तो अस्सी के दशक में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला रहा है,जो अब दंगों के लिए याद किया जाता रहा।मेरठ 1857 की पहली क्रांति के लिए अब कम याद किया जाता है।मेरठ में शायद अब चौधरी चरण सिंह नाम के देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री और शायद अब तक किसानों के सबसे बड़े नेता को भुला चुका होगा।महेंद्रसिंह टिकैत नाम के खाप पंचायतों के नेता ने जो राजधानी दिल्ली का घेरा डाला था,उसकी यादें भी अब धूमिल होने लगी है।जाट आरक्षण आंदोलन का केंद्र बना मेरठ गाजियाबाद भी अब हाशिये पर है।कपड़ा और चीनी उद्योगों के लिए कभी मशहूर रहा पश्चिम उत्तरप्रदेश की संपन्नता के पीछे खेती का जितना योगदान रहा है,उससे कम कुटीर उद्योगो का योगदान नहीं है।

हापुड़ की मंडी के क्या हाल हैं बता नहीं सकते।चीनी मिलों की चर्चा तो बकाया भुगतान के सिलिसिले में होती है।मेरठ के हथकरघे शायद अब शांत होगे।कभी मुरादाबाद और नजीबाबाद के सर्राफ देश में अव्वल होते थे,अब मुरादाबाद की पहचान पीतल नगरी के बजायरामलीलामंडलियों के नगर बतौर या फिर प्रियंका गांधी के ससुराल के लिहाज से ज्यादा होती है।फिरोजाबाद तक हुनर के अलग अलग उद्योग थे।हमें नहीं मालूम कि अब उन पीछे छूट गये शहरों और गांवों का क्या हाल है।धर्मोन्माद का जलवा हमने सबसे पहले इसी मेरठ में देखा था।मेरठ में ही मलियाना और हाशिमपुरा से घिरे हुए थे हम।हम देखते रह गये कि कैसे जनपदों की तबाही की इबारत लिखी जाती रही है और कैसे खुशहाल किसान दंगाई भीड़ में तब्दील कर दिये जाते हैं और कैसे कुटीर उद्योगों के खात्मे के साथ कापोरेट विकास की इमारते तामीर की जाती है।

पश्चिम उत्तरप्रदेश के इलाके हमारे लिए दंगाग्रस्त इंसानी बसेरे नहीं रहे कभी,वे तबाह होते हुए इस देश के संपन्न जनपद हैं।मेरी यादों में अब भी उनजनपदों की खुशबू बाकी है।पिछले दिनों अमर उजाला में हमारे साथी रहे हरिशंकर द्विवेदी की पत्नी से लिंकड इन पर बातों का जो सिलसिला चल पड़ा,वह निहायत निजी है और है भी नहीं।हम उस वक्त की यादों को साझा कर रहे थे,जो दूसरों का वक्त भी रहा है।यादे तेजी से पिर दस्तक देने लगी थीं कि ऋचा यकबयक खामोश हो गयी।आज इस अधूरे संवाद को हूबहू आप से साझा करके उस खामोशी को तोड़ने की कोशिश कर रहा हूं।चाहताहूं कि ऋचा जोर से चिल्लाएं कि मैंने ऐसा करके गलत किया और शायद इसी तरह संवाद की बंद खिड़कियां खुले और अंधेरे बियावां से कुछ और आवाजें साथियों की बह निकले कि वह वक्त तो कुछ और ही था।माननीय पलाश जी, आप अपना फोन या मोबाइल नंबर भेज देते तो कूरियर पहुंचने में आसानी होती। पीडीएफ के लिये अपना ईमेल भेजियेगा।

शेष फिर

सादर

ऋचा